अंतर धार्मिक विवाह करने के लिए किसकी अनुमति ज़रूरी है? क्या कोर्ट मैरिज रजिस्ट्रार विवाह पंजीकरण करने से इनकार कर सकता है? जानिए प्राविधान

हमारे देश में सभी पेरेंट्स का मकसद अपनी बेटी की परवरिश एक अच्छी लड़की के रूप में करने की होती है। लेकिन वह करते क्या है? बे अपनी बेटियों को दबी कुचली लड़कियों के रूप में बड़ा करते हैं। इस तरह की परवरिश आगे जाकर उन्हें शोषण का शिकार बनाती है। दरअसल लड़कियों को बचपन से ही एडजेस्ट करना सिखाया जाता है और एडजेस्ट के नाम पर उन्हें बेबस और लाचार बनाया जाता है। इसके उलट लड़कों को प्रबल और ताकतवर बनाकर पाला जाता है। अपने चारों और अच्छे और सुंदर कपड़े पहने लोगों, खासकर मिडिल क्लास को देखकर लगता है कि दुनिया बदल गई है लेकिन यह बदलाव बाहरी है अंदर से हम नहीं बदले हैं। लड़कियों को दबाने वाली सात ऐसी आदतें जो हमारे जीवन का हिस्सा बन चुकी हैं।
यौन हिंसा की जड़े कहां है? जब यह पूछा गया कि अच्छी लड़की क्या होती है तो युवाओं के जवाब हैरान करने वाले थे। उससे भी ज्यादा हैरानी की बात यह थी कि यह सब पढ़े लिखे मिडिल क्लास लोग थे। इसके बाद यह प्रोजेक्ट मेरी जिंदगी का सबसे अहम प्रोजेक्ट बन गया।
लड़कियों के अंदरूनी मामलें की कोई बात नहीं करता है। किसी लड़की को इंसान से भूत बनाने यानी उसके वजूद को नकारने की पहली शुरुआत तब होती है, जब हम उसे बताते है कि उसका कोई शरीर नहीं होता। ज्यादातर घरों में लड़की के शरीर में होने वाले बदलाव के बारे में बात ही नहीं होती। यही वजह है कि शारीरिक शोषण का शिकार होने के बावजूद लड़कियां किसी के सामने मुंह नहीं खोलती। यहाँ तक कि अपनी मां के सामने भी नहीं। बहुत बार ऐसा होता है कि 90 फ़ीसदी महिलाएं दूसरों के निगेटिव कमेंट की वजह से खुद के शरीर को ही ना पसंद करने लगती हैं। इससे उन के मन पर नकारात्मक असर पड़ता है।
अब जिसका कोई शरीर नहीं है, तो उसकी आवाज कैसी होगी? 80 फीसदी महिलाओं ने बताया कि उन्हें बचपन से ही बात बात पर यह कहा गया-आराम से बात करो, प्यार से बात करो, ज्यादा मत बोलो, पलट कर जवाब मत दो और चुप रहो कहा गया। साथ ही जाने दो, क्या फायदा, यह भी बार-बार सुनाया गया। पढ़ी लिखी महिलाओं ने भी कहा कि उनकी सबसे बड़ी समस्या चुप रह जाना है। किसी के सामने बोल नहीं पाना रहा है।
हमेशा दूसरों को खुश रखो कभी किसी से ना मत कहो, किसी से नाराज मत हो, हमारे देश में लड़कियों को बचपन से यही सिखाया और समझाया जाता है। मैं बहुत पॉजिटिव हूं जो दूसरे चाहते हैं, मैं वह आसानी से कर लेती हूं ऐसी सोच के कारण ही लड़कियां दूसरों को खुश करने के लिए अपनी खुशी और पसंद की अनदेखी करती जा रही है। और फैसले लेने से डरने लगती हैं।
हमारे देश की इतनी बड़ी आबादी यह बताने के लिए काफी है कि सेक्स हमारे लिए कोई नई बात नहीं है। जनसंख्या के मामलें में तो हम जल्द ही चीन को पीछे छोड़ने वालें है। लेकिन कोई महिला अपनी सेक्सुअलिटी की बात करें, तो यह वाकई नई बात होती हैं। लोगों को यह बर्दाश्त नहीं होता कि कोई लड़की या महिला अपने सेक्सुअल इच्छा या प्राथमिकता के बारे में बात कैसे कर सकती है? पुरुष जब सेक्स की इच्छा जताता है तो वह स्वीकार्य है लेकिन जिस महिला को अपने शरीर से प्यार करने का हक नहीं है, उसे सेक्सुअलिटी जाहिर करने का हक कहां से होगा।
हमारे समाज में पुरुषों पर भरोसा ज्यादा किया जाता है लेकिन जब बात आती है महिलायों पर ही भरोसा करने की तो सब बगलें झाँकने लगते हैं। इसके पीछे का तर्क देते हुए लोग कहते हैं कि महिलाएं जलनखोर होती है और पीठ पीछे बुराई करती है। सोंचिये जब पढ़ी लिखी महिलाएं ऐसा कहती है तो बाकियों के बारे में क्या कहें? महिलाओं का एकजुट न होना उन्हें हराने या खत्म करने में काफी मदद करता है।
समाज जब एक अच्छी लड़की की परिभाषा बताता है तो संदर्भ दयालु, सौम्य, बिना शर्त दूसरों की मदद करने वाली, प्यार करने वाली, अपनी हर जिम्मेदारी पूरी करने वाली होना ही बताता है। उफ्फ....काफी थकानेवाली है यह लिस्ट जिम्मेदारी को पूरा करते-करते अपनी चाहते पीछे छोड़ देती है।
अपने हर काम के लिए पुरुषों पर निर्भर रहना महिलाओं को और कमजोर बनाता है। यह सात आदतें जो हमें अच्छी और संस्कारी तो लगती हैं लेकिन इन्होंने महिलाओं के वजूद को खत्म किया है। दरअसल हमें लचीली महिलाएं नहीं चाहिए, हमें लचीली परिभाषाएं चाहिए। हमें ऐसे पुरूष चाहिए, जो हमारा साथ दें। महिलाओं अब तुम्हें एडजस्ट नहीं करना पुरुषों को एडजेस्ट करना है।
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